आँधियों से जो लड़े हैं ,
हां, वही तिनके बड़े हैं !
तीर्थ हैं वे पाँव जिनमे,
शूल भीतर तक गडे हैं !
सिर्फ़ हे -इतनी कहानी ,
उम्र की सूली चढ़हे हैं !
ग़मों का सोना मिला हैं ,
ग़ज़ल के गहने गडे हैं !
फकत ,इक तब्बसुम की खातिर
कितने ज़हर पीने पड़े हैं !
जहाँ नम पलकों ने छोड़ा
हम वहीँ अब तक खड़े हैं !
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Wednesday, November 12, 2008
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