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Wednesday, November 12, 2008

ग़ज़ल २

आँधियों से जो लड़े हैं ,

हां, वही तिनके बड़े हैं !

तीर्थ हैं वे पाँव जिनमे,

शूल भीतर तक गडे हैं !

सिर्फ़ हे -इतनी कहानी ,

उम्र की सूली चढ़हे हैं !

ग़मों का सोना मिला हैं ,

ग़ज़ल के गहने गडे हैं !

फकत ,इक तब्बसुम की खातिर

कितने ज़हर पीने पड़े हैं !

जहाँ नम पलकों ने छोड़ा

हम वहीँ अब तक खड़े हैं !

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