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Wednesday, November 12, 2008

ग़ज़ल १

ना ही कतरा हूँ ,ना ही समंदर हूँ,

एक लम्हा हूँ,ख़ुद के अन्दर हूँ !

जिसकी दीवार पर ठुकी कीलें ,

कच्ची माटी का, एक वोः घर हूँ !

झिलमिला के गहरे डूब गया ,

भीगी पलकों का ,एक पल भर हूँ !

जलते जंगल में ,घिर के टूट गया ,

इक मासूम परिंदे का अधजला 'पर' हूँ !

एक सैलाब ने कहीं का ना रखा ,

अब तो यादों का खँडहर हूँ !

ये रफतारें कहाँ ले जाएँगी ,

सदी की आँख में ,ठहरा हुआ डर हूँ !

जानें क्या से क्या हुआ होता ,

दुआ की गोद में रखा सर हूँ !



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