ना ही कतरा हूँ ,ना ही समंदर हूँ,
एक लम्हा हूँ,ख़ुद के अन्दर हूँ !
जिसकी दीवार पर ठुकी कीलें ,
कच्ची माटी का, एक वोः घर हूँ !
झिलमिला के गहरे डूब गया ,
भीगी पलकों का ,एक पल भर हूँ !
जलते जंगल में ,घिर के टूट गया ,
इक मासूम परिंदे का अधजला 'पर' हूँ !
एक सैलाब ने कहीं का ना रखा ,
अब तो यादों का खँडहर हूँ !
ये रफतारें कहाँ ले जाएँगी ,
सदी की आँख में ,ठहरा हुआ डर हूँ !
जानें क्या से क्या हुआ होता ,
दुआ की गोद में रखा सर हूँ !
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Wednesday, November 12, 2008
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